लोकतांत्रिक व्यवस्था में रखिये अटूट विश्वास और समृद्ध साहित्य से लीजिये प्रेरणा

लोकतांत्रिक व्यवस्था में रखिये अटूट विश्वास और समृद्ध साहित्य से लीजिये प्रेरणा
@ डॉ दिनेश चंद्र सिंह/आईएएस

लोकतांत्रिक व्यवस्था में अटूट विश्वास रखकर ही छात्रगण इसे अपने अनुरूप ढाल सकते हैं। यही बात आम नागरिकों पर भी लागू होती है, चाहे वह आम हो या खास। ऐसा इसलिए कि लोकतंत्र में सभी भारतीय नागरिकों को व्यस्क मताधिकार का अधिकार प्राप्त है। 

भारतीय संविधान की धारा 325 के विशेष प्राविधान के अंतर्गत धर्म, मूल, वंश जाति या लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है। कहने का तातपर्य यह कि किसी भी व्यक्ति का नाम निर्वाचक नामावली में सम्मिलित किए जाने के लिए उपर्युक्त आधार पर अपात्र नहीं ठहराया जा सकेगा। हां, यदि उसके द्वारा किसी विशेष निर्वाचन नामावली में नाम सम्मिलित किए जाने का दावा न किया गया हो तो उसका नाम उस सूची में शामिल नहीं रह पाएगा।

वहीं, संविधान की धारा 326 में यह विशेष प्राविधान है कि लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के लिए निर्वाचनों को वयस्क मताधिकार के आधार पर होना है, अर्थात ऐसा भारतीय नागरिक जिसने अहर्ता (अरहक) आयु 18 वर्ष क्वालिफाइड डेट प्रत्येक वर्ष की 1 जनवरी को पूर्ण करती है, तो वह फोटो निर्वाचक नामावली में अपना नाम रजिस्टर्ड कराकर विशिष्ट एवं अहर्ता (अरहक) विधानसभा क्षेत्र की फोटो निर्वाचक नामावली में अपना नाम दर्ज करवाकर, लोकसभा एवं विधानसभा के निर्वाचनों में अपने मत का प्रयोग कर सकता है।

कहने का आशय यह कि यह मताधिकार लोकतंत्र की वह शक्ति है जहां से शुरू होता है संविधान प्रदत्त उन पदों पर आरूढ़ होने की प्रक्रिया, जिसमें लोकतंत्र का प्रत्येक नागरिक बिना किसी भेदभाव के अपने उस स्वप्न को प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प कर इतिहास का प्रणेता बन सकता है। वह संवैधानिक पद है- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्य के राज्यपाल, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्र एवं राज्य के विभिन्न मंत्रिमंडल के मंत्री पद का। साथ ही न्यायपालिका में सर्वोच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय एवं अन्य न्यायालय के विविध न्यायाधीश की श्रेणी के उच्चतम एवं कनिष्ठ पद तथा भारतीय संविधान के अंतर्गत कार्यपालिका के कर्णधार एवं ऐसे स्तंभ जिनके बिना किसी सहयोग एवं उत्कृष्ट साहस क्षमता के ही किसी भी प्रकार के कानून का क्रियान्वयन किए जाने की संभावना नहीं रहती है। 

वहीं, भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा एवं अन्य सेवा के अधिकारी तथा राष्ट्र की सभी प्रकार से सुरक्षा करने एवं देश की एकता व अखंडता के प्रति सजग, अडिग, दृढ़ निश्चय एवं दृढ़ संकल्प के साथ अपने प्राणों के उत्सर्ग हेतु सेवा में प्रवेश का वचन लेकर हमारे राष्ट्र के जल थल एवं नभ में कठोर तपस्या, त्याग, बलिदान, संघर्ष एवं दृढ़ इच्छाशक्ति, शौर्य, पराक्रम, वीरता, साहस के साथ सब कुछ उत्सर्ग करने की क्षमता, बाहुबल, आत्मबल, शैक्षिक बल एवं अपने को हर पल खोने की अदम्य क्षमता रखने वाले हमारे सुरक्षा बल, जिनकी त्याग की कसौटी पर हमारी सीमाएं सुरक्षित है।

साथ ही विभिन्न सेवाएं जिनमें हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ प्रेस है, जिनकी क्षमता एवं दूरदर्शिता अपार एवं अतुलनीय है। और प्रेस से जुड़े करोड़ों ऐसे भारतीय योग्य नागरिक हैं जिनके कुछेक चुने व चिन्हित नागरिक एवं सेवा योग्य कार्मिकों को छोड़कर शेष अच्छा लिखने एवं सच को अनावृत करने की संघर्ष की प्रक्रिया में बहुत अधिक परेशानी एवं संघर्ष की जिंदगी व्यतीत करते हैं। ऐसे सेवा धर्मी, राष्ट्र प्रेमी, प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के योग्य संघर्षशील व्यक्तियों को भी अपनी लेखनी का अभिन्न अंग मानकर मैं कहना चाहूंगा कि लोकतंत्र ही सर्वोच्च एवं उत्कृष्ट शासन प्रणाली है, जिसमें सभी अपने सपने को साकार करने का संकल्प लिया करते हैं। 

अब बात है विभिन्न चुनौतियों की तो हमारे ध्यान से मतदान तिथि पर लोकतंत्र के पवित्र मंदिर, मतदेय स्थल पर मतदान करते समय यह देखना है कि हम अपना अमूल्य मत बिना किसी मूल्य के कहां दे रहे हैं। इस संदर्भ में अपनी परिकल्पना को निम्न शब्दों में व्यक्त करना चाहूंगा। मेरा उद्देश्य एवं परिकल्पना एक ऐसे सर्वमान्य स्थान की खोज की है जहां हम सब बराबर हैं, वह स्थान है मतदान तिथि पर स्थापित किए जाने वाला मतदान स्टेशन अर्थात मतदेय स्थल जिसकी परिकल्पना मेरे द्वारा लोकतंत्र का मंदिर से वर्ष 2016 में अभिव्यक्त किया गया था जब जहां सब बराबर है। 

कहने का आशय यह कि मतदान तिथि पर न्यूनतम 20 वर्ग मीटर की परिधि में स्थापित किए जाने वाला मतदान स्टेशन जहां सब बराबर है, भारतीय लोकतंत्र में मतदान केंद्र अपनी तरह का एकमात्र सार्वजनिक स्थान है जहां वास्तविक सामाजिक विविधता है, जहां महिलाएं भयभीत नहीं है, अति विशिष्ट व्यक्तियों को कतार तोड़कर कटार के सामने करने के लिए नहीं लाया जा सकता है तथा मतदान केंद्र पर मतदान तिथि पर सामान्य अति विशिष्ट लोगों को कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने के लिए विधिक रूप से मजबूर होना पड़ता है।

मतदेय स्थल वह स्थल होता है जहां इस बात की परवाह नहीं रहती कि जाति, धर्म व वर्ग, स्वयं का रंग या उसकी पोशाक की समृद्धि और महिलाओं को उनके घरेलू नौकर और सोने की घड़ियां पहने पुरुषों के पीछे कतार में अपने पैरों पर जूते के बिना पीछे खड़े रहने की स्वतंत्रता है, जहां पात्रता या विशेषाधिकार का कोई मतलब नहीं काम करता है। 

भारतवर्ष विविधताओं और समानताओं से भरा एक संगठित देश है परंतु मतदान तिथि पर मतदाताओं को मतदान केंद्र पर किसी प्रकार की और समानता एवं विशिष्टता का आभास नहीं होता है। इसलिए मतदान केंद्र मेरे अभिमत से लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत एक ऐसा पवित्र स्थान है जहां पर सभी प्रकार की विषमताएं, असमानताएं स्वत: समाप्त होती नजर आती हैं और मतदाता को केवल और केवल फोटोयुक्त निर्वाचक नामावली में नाम अंकित होने के आधार पर व्यक्तिगत पहचान के बिना किसी भेदभाव के प्राप्त होती है तथा वोट करने के लिए अपने कर्तव्य का पालन पूर्ण करने के पश्चात मतदाता अपने सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार का पालन करने का भाव अनुभव करता है और उसकी उंगली पर लगी इंक (स्याही) उसको भारत का नागरिक/मतदाता होने का गौरव प्रदान करती है। क्योंकि उसे एहसास होता है कि लोकतंत्र और उसपर आधारित लोकतांत्रिक प्रणाली ही उसे समानता, गरिमा एवं सभ्यता का अधिकार प्रदान करा सकती है।

अतः हमें हर कीमत पर सभी निर्वाचनों में अपने मत का नैतिक मतदान कर लोकतांत्रिक मूल्यों की अक्षुण्णता बनाए रखने हैं। उसी दिशा में हम बराबरी के ऐसे पवित्र स्थान का दर्शन निरंतर मतदान तिथि पर बिना किसी भेदभाव के करते रहेंगे और उसी के प्रयोग से अन्य सार्वजनिक जीवन में प्रचलित असमानता की, रूढ़िवादिता को ध्वस्त कर समृद्धशाली, लोक कल्याणकारी राष्ट्र की परिकल्पना को मूर्त रूप प्रदान करने में सफल होंगे। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हम सब भारत के लोग मिलकर मजबूत लोकतंत्र एवं अखंड भारत वर्ष के निर्माण में एक लोक सेवक के रूप में काम करें। यह सपना/ परिकल्पना उसी दिशा में साकार होगी।

अब चर्चा करते हैं प्रश्न गत समय में प्रतियोगी परीक्षा में भाग्य आजमा रहे युवाओं की। यह सच है कि लोकतंत्र में संविधान सर्वोपरि है और संविधान प्रदत्त व्यवस्था में ही सबको अपना भाग्य अजमाना है। किसी प्रकार की निराशा अथवा वेदना संघर्ष क्षमता को प्रभावित करती है। इसलिए हमें ऐसे समय में साहित्य से ऊर्जा लेनी चाहिए, क्योंकि उत्कृष्ट साहित्य समाज का दर्पण होता है। उसमें अभिव्यक्त भाव आपकी तेजस्विता, संघर्ष क्षमता एवं उर्जा को बढ़ाकर मनवांछित उपलब्धि प्राप्त करा सकते हैं। तो आइए हम ऊर्जा एवं प्रेरणा के लिए दिनकर जी का स्मरण निम्नलिखित पंक्तियों से करते हैं-

तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के। 
पाते हैं जग से प्रशस्ति अपना करतब दिखला के।। 
वसुधा का नेता कौन हुआ? 
भूखंड विजेता कौन हुआ? 
अतुलित यश-क्रेता कौन हुआ? 
नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ? 
जिसने कभी आराम किया। 
विघ्नों में रहकर काम किया। 
जब विघ्न सामने आते हैं।
सोते से हमें जगाते हैं। 
मन को मरोड़ते हैं पल-पल।
 तन को झकझोरते हैं पल-पल। 
सत्पथ की ओर लगाकर ही।
 जाते हैं हमें जगा कर ही।

 अर्थात यदि वसुधा का नेता बनना अथवा आईएएस में चयन पाना है, नेतृत्व क्षमता को विकसित कर अपना नाम रोशन कर राष्ट्र के लिए मानव जन्म लेकर अपनी उपादेयता को सिद्ध करना है तो बच्चों उठो, जागो और विघ्नों में रहकर नाम करो। अतुलित यश क्रेता बनकर सदियों के लिए अपनी मिशाल बनने की लालसा को सिद्ध करने के दिवास्वप्न को अपनी कर्मठता से प्राप्त करें, निश्चित ही विजय आपको और ऐसे प्रतियोगियों को अवश्य मिलेगी।

मैं यह अवगत कराना या वर्णन करना चाहूंगा कि वर्तमान परिदृश्य में केंद्र एवं राज्य में मोदी एवं योगी सरकार में सभी कुछ पारदर्शी है एवं ईमानदारी से अपनी क्षमता का उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सेवा के किसी भी क्षेत्र में आप अपनी योग्यता, दक्षता, निष्ठा एवं कर्मठता से अपना मुकाम बना सकते हैं। इसलिए किसी भी प्रकार की चिंता, निराशा का सामना आप सभी को नहीं करना चाहिए, क्योंकि आपके परिश्रम करने की क्षमता ही इस स्थिति में उबार सकती है। आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संघर्ष एवं प्रतिस्पर्धा है, इसलिए किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट सफलता के लिए जीवन में शुचिता, उत्कृष्टता एवं नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता के साथ निष्ठा एवं इमानदारी पूर्वक लक्ष्य भेदने की संघर्ष शैली को विकसित करना होगा। वह क्षेत्र चाहे शिक्षा का सेवा का हो, उद्यम या व्यापार का हो अथवा राजनीति में प्रवेश का, सभी क्षेत्र में बहुत अधिक प्रतिस्पर्धा है। अतः समानता का रास्ता, सफलता का रास्ता आप सभी युवाओं को इन्हीं कंकड़ीली एवं कंटकाकीर्ण मार्ग से होकर यानी गुजर कर प्राप्त करना है। और यह राह वर्तमान में पारदर्शी एवं निष्पक्ष राजनीतिक व्यवस्था के कारण आसान है। मेरा यह कहना नहीं है कि पूर्व में कहीं कोई परेशानी थी, परंतु आज हर क्षेत्र में अवसरों की विविधताएं हैं। अवसर अधिक है। पूर्व की तुलना में जहां अवसर सीमित थे और सीमित अवसरों में सफलता कठिन होती थी तथा अवसरों में विविधताएं नहीं थी। आज हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर हैं। नैतिकता उस दौर में भी थी, अन्यथा हमारे जैसे ग्रामीण एवं कृषक परिवार की पृष्ठभूमि के लोग के लिए उत्कृष्ट प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करना संभव नहीं होता। परंतु समय निरंतर परिवर्तनशील होता है। आज परिवर्तन के इस दौर में पूर्व की भांति ज्यादा निष्पक्षता है। इसलिए सफल होने की गारंटी भी उतनी ही अधिक है। अतः सभी प्रकार के भ्रम एवं संदेह से ऊपर उठकर केवल लक्ष्य केंद्रित परिश्रम ही सफलता की एक मात्र कसौटी है।

इसलिए सभी युवाओं को, जो अपने सामने अनेकों चुनौतियों को देख रहे हैं, उनके लिए दिनकर जी के निम्न प्रसिद्ध भाव प्रेषण कविता के माध्यम से साहस देना चाहूंगा कि कितनी भी विषम परिस्थितियां हो, मानव उन सबसे विजय पा सकता है, यदि वह स्मरण रखें, याद करें, इन भावों को। वह यह कि.....

जूझ वीरता से, प्रचंडता से बलिष्ट तन-मन से, 
आंख मूंदकर जूझ अंधनिर्दयता पागलपन से, 
समर पाप साकार, समर क्रीड़ा है ग्राह्यपनकी, 
सभी विधाएं व्यर्थ समर में साध्य और साधन की,
एक वस्तु है ग्राह्य युद्ध में, 
पुण्य हो कि हो या घोर पाप, 
सभी कुछ देय है, 
जीत केवल दोनों का ध्येय है। 

इसलिए प्रतियोगी छात्र-छात्राओं के लिए मेरा सुझाव है कि पागलपन, वीरता, प्रचंडता, बलिष्ट तन और मन से केवल जीत के लिए युद्ध करो, साधना करो और योग से तन-मन को बलिष्ट करो तथा पागलपन से ग्राह्य युद्ध में सफलता के लिए ध्यान केंद्रित कर अर्जुन की तरह केवल आंख पर निशान केंद्रित करो, अन्य अवरोधक समस्याएं एवं व्यवस्था को मत देखो। क्योंकि सीटें सीमित एवं कुछ चिन्हित होती हैं, जिसने लक्ष्य केंद्रित कर युद्ध में भाग लिया, उसकी विजय निश्चित है। उठो, जागो और जब तक लक्ष्य प्राप्त ना हो जाए, युद्ध में निडर होकर बलिष्ट तन मन से पागलपन के साथ भाग लो, आपको विजय अवश्य मिलेगी।

कहना न होगा कि साहित्यकार एवं कवि त्रिकालदर्शी होता है, जो वह देखता है, वह विज्ञान व आधुनिक खोज भी नहीं देख सकती है। इसलिए हमारे साहित्य एवं ग्रंथ, भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है एवं उसको आत्मसात करने के उद्देश्य से जो भी अध्ययन करता है, वह विजयी एवं सफल एवं उत्कृष्ट मानव बनता है।

(लेखक उत्तरप्रदेश के बहराइच जनपद के जिलाधिकारी हैं।)

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